ख़ानाबदोश चाहतें.....वो ख्वाहिशे जो मेरे अंदर बरसती रहती है., भीगती है..मचलती है..तड़पती है,..कुछ बिल्कुल वैसे ही जैसे की ओस की बूंद दूर से चमकती है, मन को ठंडक देती है लेकिन प्यास नही बुझाती। भागती दौड़ती इन चाहतों में ना जाने क्या हासिल करने की चाहत है...ना जाने कौन सी तलाश है..। मन के किसी कोठरी में सालों से दम तोड़ती इन ख्वाहिशों को ज़िन्दा करने की कोशिश है .... ख़ानाबदोश चाहतें....